Bhu अस्पताल में चिकित्सको की मनमानी,मरीजों की बढ़ी परेशानी

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…….बाउंसर और सुरक्षा कर्मी असहाय बीमारों उनके परिजनों से करते है गाली गलौज, दुर्व्यवहार-मारपीट
…..वरिष्ठ चिकित्सक प्रो. वीके दीक्षित रहते है अक्सर गायब, जूनियर डॉक्टर करते है दलालों के इशारे पर इलाज
……चिकित्सकों के आस पास मंडराते रहते है दवा-जांच लिखवाने के लिये दलाल, डॉक्टर को देते है मोटी कमीशन


संजल प्रसाद (वरिष्ठ पत्रकार)
वाराणसी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में सरसुंदर लाल चिकित्सालय (बीएचयू) में जूनियर डॉक्टरों की मनमानी से गरीब जनता का बुरा हाल बना हुआ है। आये दिन अस्पताल के बाउंसर, सुरक्षा गार्ड और दलाल असहाय बीमारो और उनके परिजनों के साथ दुर्व्यवहार, गाली गलौज और मारपीट करते रहते है। ऐसा ही एक मामला शुक्रवार को देखने को मिला जब गैस्ट्रोलॉजी के वरिष्ठ चिकित्सक प्रो. वी.के. दीक्षित कुछ देर बैठने के बाद पूरी व्यवस्था अपने तीन जूनियर चिकित्सक के ऊपर छोड़कर चले गए। कहाँ गए, आएंगे भी नही यह किसी को पता नही। मजबूरी में असहाय सैकड़ों मजबूर, परेशान मरीज जूनियर डॉक्टर को दिखाना शुरू कर दिये। चिकित्सक जिस भी मरीज को देखते थे वह बताता कुछ था लेकिन चिकित्सक सिर्फ अपनी जेबें गर्म कर मोटी कमाई के लिए बाहरी जांच और दवा लिखने में मशगूल रहे। इस कार्य मे अस्पताल के ओपीडी कक्ष में और आसपास मौजूद दवा विक्रेता/दलाल भी काफ़ी सक्रिय रहते है। या यह भी मान सकते है कि दलालो के इशारे पर ही महंगी से महंगी बाहरी दवा/ जांच खुलेआम लिखी जा रही है। गैस्ट्रोलॉजी विभाग का हाल यह है कि यहाँ खामिया ही खामिया है। मनमाने तरीके से जूनियर डाक्टरो को मरीजो को जबरन दिखाया जाता है। जो मरीज एक सप्ताह में ठीक हो सकता है उसे जबरदस्ती तीन-तीन महीने की दवा खरीदने और उसे लाकर दिखाने का दबाव बनाया जा रहा है। वही यहां के जूनियर डॉक्टर इतने बदमिजाज, बेशर्म, मनबढ़ है कि मरीज की पूरी समस्या भी नही सुनते है और अपनी मनमानी करते हुए मरीजो को महंगी दवा- जांच लिख रहे है। जबकि बीएचयू अस्पताल इसलिए बनाया गया था कि गरीब मरीज का इलाज कम से कम पैसे में हो सके। लेकिन हो रहा है उल्टा, यहां चिकित्सक मरीजो को जमकर लूटने में कोई कसर नही छोड़ रहें है। जिस जांच, दवा की आवश्यकता मरीज को नही के बराबर है उसे भी अपनी जेब गर्म करने के लिए दबाव बनाकर, मानसिक, शारिरिक शोषण करके लिख रहे है। बकायदे जांच कहाँ करवाना है, दवा किस दुकान से लेनी है वह भी मरीज और उनके परिजन को बता कर इसलिए भेजा जा रहा है ताकि उनका कमीशन कम न होने पाये। यदि कोई मरीज या उसके परिजनों ने गलती से भी किसी दवा/ जांच के बाबत कोई जानकारी पूछ ली या दवा लेने में, जांच कराने में असमर्थता दिखाई तो वही जूनियर डॉक्टर उनके साथ दुर्व्यवहार, गाली गलौज, मारपीट पर आमादा हो जा रहें है। इसमें वहाँ पर मुस्टंडे बाउंसर, सुरक्षा गार्ड अपनी ताकत का एहसास दिखाकर मरीजों और उनके परिजनों को डराते-धमकाते रहते है। यदि इन सब हरामखोरों पर चिकित्सा अधीक्षक, बीएचयू प्रशासन अविलंब लगाम नही लगाती है तो गरीब मरीजों का इलाज करवाना भी असम्भव हो जाएगा। जिस सपने को लेकर मदन मोहन मालवीय जी ने इस अस्पताल परिसर की स्थापना की थी उसे मिट्टी में मिलते देर नही लगेगी। बताते चले कि गैस्ट्रोलॉजी विभाग के वरिष्ठ चिकित्सक प्रोफेसर वी. के. दीक्षित को जब मरीजो को नही देखना होता है तो सूचना के माध्यम से मरीजो को अवगत करा देना चाहिए ताकि मरीज किसी अन्य अस्पताल में अपना इलाज समय से करवा सके। सूत्रों की माने तो अक्सर प्रोफेसर वी.के. दीक्षित अपने चेम्बर से गायब ही रहते है, जबकि मरीजो की बड़ी तादात उन्हें ही दिखाने जाती है और उनसे मिलने की लिए कई कई घण्टे इंतजार करती है। लेकिन मरीज जब उनको नही दिखा सकता है तो उसे काफी कष्ट होता है, निराशा होती है। क्योंकि मरीज सैकड़ों किलोमीटर दूर से अपना सब कुछ नुकसान करके उनके नाम पर बीएचयू आता है। ऐसा भी नही है कि उनसे कम जानकार वाराणसी में चिकित्सकों की कमी है। ऐसे में प्रोफेसर वीके दीक्षित को चाहिए कि कम से कम ओपीडी के दिन तो वह मरीजो को पूरा समय दें। यदि नही दे सकते है तो इस्तीफा देकर या वीआरएस लेकर बीएचयू को अलविदा कह दें। सबसे खास बात तो यह है कि इनके जूनियर डॉक्टर खुद को देवता का अवतार मानते है और काम राक्षसों जैसा करते है। चंद रुपये की मासिक नौकरी करने वाले यहां के बाउंसर और सुरक्षा गार्ड इतने बत्तमीज है कि मरीज़ो के साथ तुम तड़ाक कर बोलना इनकी दिनचर्या हो गई है। संस्कार नाम की कोई चीज ही नही बची है। जबकि कई ऐसे उम्रदराज, जिम्मेदार अधिकारी, कर्मचारी, मीडियाकर्मी और धनवान मरीज इलाज करवाने जाते है जिनके घर पर इन बाउंसर और सुरक्षा गार्ड से कई गुना वेतन पाने वाले दर्जनो कर्मचारियों की फौज होती है।

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