फाइलेरिया रोगियों की देखभाल व प्रबंधन के लिये आयोजित हुआ कार्यक्रम

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30 रोगियों को प्रदान की एमएमडीपी किट, नियमित इस्तेमाल के लिए दिया प्रशिक्षण

रोगी सहायता समूह के सदस्यों ने कहा एमएमडीपी किट से मिल रहा फायदा

बीएचयू के बायो कैमिस्ट्री विभाग की टीम ने रोगियों का लिया ब्लड सैंपल, करेंगे अध्ययन

वाराणसी । राष्ट्रीय फाइलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम के अंतर्गत बृहस्पतिवार को बड़ागांव प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के चिलबिला गाँव पंचायत भवन में रुग्णता प्रबंधन व दिव्यांग्ता रोकथाम (एमएमडीपी) कैंप व जांच अभियान चलाया गया। मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) डॉ संदीप चौधरी के निर्देशन में कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें सेंटर फॉर एडवोकेसी एंड रिसर्च (सीफार) संस्था ने भी सहयोग किया। इस दौरान बीएचयू के चिकित्सक व उनकी टीम ने पूर्व में चिन्हित लिम्फोडेमा (हाथ, पैर व स्तन में सूजन) रोगियों के अध्ययन के लिए मरीजों व उनके परिजनों की भी जांच की।
कार्यक्रम में लिम्फ़ेटिक फाइलेरियासिस (फाइलेरिया) से ग्रसित मरीजों की ग्रेडिंग करते हुये प्रभावित अंगों की देखभाल के लिए एमएमडीपी किट प्रदान की। एलबीएस चिकित्सालय रामनगर स्थित फाइलेरिया नियंत्रण इकाई के प्रभारी डॉ अमित कुमार सिंह ने रोगियों को एमएमडीपी किट के इस्तेमाल के लिए प्रशिक्षण दिया। यह बीमारी न सिर्फ व्यक्ति को दिव्यांग बना देती है बल्कि इस वजह से मरीज की मानसिक स्थिति पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। इस बीमारी के लक्षण शुरुआत में नहीं दिखते हैं, इसके लक्षण पाँच से दस साल में देखने को मिलते हैं। इससे बचाव के लिए सोते समय मच्छरदानी का प्रयोग करें। घर व आस-पास साफ-सफाई, जल जमाव को नष्ट कर वाहक मच्छरों से बचा जा सकता है।
डॉ अमित ने बताया कि फाइलेरिया ग्रसित अंगों में मुख्यतः पैर की साफ-सफाई रखने से संक्रमण का डर नहीं रहता है और नियमित व्यायाम व योगा करने से सूजन में भी कमी रहती है। इसके प्रति लापरवाही बरतने पर अंग खराब होने लगते हैं और समस्या बढ़ जाती है। इसको बढ़ने से रोकने के लिए आवश्यक दवा भी दी जा रही है। उन्होंने बताया कि जिनके हाथ-पैर में सूजन आ गई है या फिर उनके फाइलेरिया ग्रस्त अंगों से पानी का रिसाव होता है। इस स्थिति में उनके प्रभावित अंगों की साफ-सफाई बेहद आवश्यक है। इसलिए एमएमडीपी किट प्रदान की जा रही है। इस किट में एक-एक टब, मग, बाल्टी तौलिया, साबुन, एंटी फंगल क्रीम आदि शामिल हैं। फाइलेरिया रोगी सहायता समूह (पीएसजी) नेटवर्क के सदस्य समुदाय को फाइलेरिया के प्रति जागरूक कर रहे हैं। साथ ही बीमारी से जुड़े मिथक को भी दूर कर रहे हैं।
बीएचयू के बायो केमिस्ट्री विभाग की टीम शिवानी, तृप्ति व सुनील ने स्वास्थ्य विभाग द्वारा पूर्व में चिन्हित फाइलेरिया ग्रसित रोगियों व उनके घर के सदस्यों का ब्लड सैंपल लिया। नजदीकी क्षेत्र में सर्वे भी कराया गया। यह अध्ययन लिम्फ़ेटिक फाइलेरियासिस को गहनता से समझने में मदद करेगा, जिससे इस बीमारी के उपचार को खोजा जा सके। इस मौके पर ग्राम प्रधान सभाजीत सरोज, राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज चौकाघाट स्थित आईएडी फाइलेरिया सेंटर से विक्रमादित्य, एसएलटी परशुराम गिरी, कीट संग्रहकर्ता केपी सिंह, सीफार के प्रतिनिधि व अन्य लोग मौजूद रहे।
पीएसजी के रोगियों ने सराहा – माँ सरस्वती सहायता समूह की सदस्य कलावती देवी (65) ने बताया कि उन्हें करीब 30 साल से हाथीपाँव बीमारी है। पहले बहुत झाड़ फूंक करवाया, कुछ घरेलू दवाओं का भी सेवन किया पर कोई फायदा नहीं हुआ। पहले इस उपचार के बारे पता नहीं था लेकिन गाँव के समूह से जुड़ने के बाद डॉक्टर से इसकी देखभाल के लिये सम्पूर्ण जानकारी मिली और एमएमडीपी किट भी दी गई। अब वह अपने सूजे हुये पैरों की नियमित देखभाल व व्यायाम कर रही हैं। इससे काफी आराम मिल रहा है। एक अन्य सदस्य प्रभावती (45) ने बताया कि वह करीब 25 साल से इस बीमारी से ग्रसित हैं। उन्हें पहले बच्चे के समय पैर में सूजन थी यही भ्रांति मुझे शुरू से थी लेकिन समूह से जुड़ने के बाद पता चला कि फाइलेरिया मच्छर काटने से ही होता है। इसके लक्षण कई सालों बाद देखने को मिलते हैं। अब किट के जरिये वह अपने सूजे हुये पैरों की साफ-सफाई और देखभाल करती हैं। साथ ही योगा व सामान्य व्यायाम करने से आराम मिल रहा है। इसके अलावा फाइलेरिया से बचाव के बारे में लोगों को जागरूक भी कर रहे हैं।

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