काशी के मूर्धन्य आचार्य गणेश्वर शास्त्री द्रविड़ ने राम मंदिर मुहूर्त का किया शंका समाधान

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काशी के मूर्धन्य विद्वान आचार्य गणेश शास्त्री द्रविड़ जी जिन्होंने राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का मूहूर्त निकाला, पत्र के माध्यम से राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के संदर्भ में दो प्रश्न पूछे गये जिसका शंका समाधान उन्होंने किया।

प्रथम प्रश्न-
“क्या शिखर का कार्य पूर्ण न होने की स्थिति में राममन्दिर में मन्दिर अधूरा रहने पर श्री रामजी की प्रतिष्ठा शास्त्रसम्मत है?

देवमन्दिर की प्रतिष्ठा दो प्रकार से होती है
(१) सम्पूर्ण मन्दिर बन जाने पर तथा (2) मन्दिर में कुछ काम शेष रहने पर भी। जहाँ पर सम्पूर्ण मन्दिर बन जाने पर देवप्रतिष्ठा होती है वहाँ गर्भगृह में देवप्रतिष्ठा होने पर मन्दिर के ऊपर कलशप्रतिष्ठा संन्यासी के द्वारा की जाती है। कलशप्रतिष्ठा गृहस्थ के द्वारा नहीं होती।

गृहस्थ के द्वारा कलशप्रतिष्ठा होने पर वंशक्षय होता है। मन्दिर का पूर्ण निर्माण हो जाने पर देवप्रतिष्ठा के साथ मन्दिर के ऊपर कलशप्रतिष्ठा होती है। जहाँ पर मन्दिर पूर्ण नहीं बना रहता वहाँ देवप्रतिष्ठा के बाद मन्दिर का पूर्ण निर्माण होने पर किसी शुभदिन में उत्तम मुहूर्त में मन्दिर के ऊपर कलशप्रतिष्ठा होती है। अतएव वैदिक-मूर्धन्य श्री अण्णाशास्त्री वारे महोदय द्वारा निर्मित ‘कर्मकाण्डप्रदीप’ ग्रन्थ में पत्र ३३८ में इति व्रतोद्यापन-वदध्वहःसाध्यः सर्वदेवप्रतिष्ठा प्रयोगः समाप्ति के
बाद अथ कलशारोषणविधिः” से आरम्भ कर इति प्रतिष्ठासारदीपिकोक्त: कलशारोपणविधिः” तक स्वतन्त्र
रूप से कलशारोपणविधि दी गयी है।

पाक्चरात्रागम में ईश्वरसंहिता का अग्रिमवचन भी उक्त व्यवस्था के विरुद्ध नहीं है। वचन इंसप्रकार है-
” प्रासादाङ्गेषु विप्रेन्द्राः! क्रमान्निगदितेषु च |
देवताधारभूतेषु यद्यदर्ज न कल्पितम् ॥
यंत्र वा तत्तदधिकं तत्रापि च समाचरेत् ।
तत्तत्स्थाने तु बुद्ध्या तु देवतान्यासमूहतः ॥”
(ईश्वरसंहिता अध्याय ३ श्लोक १६५-१६६५०३२)

बृहन्नारदीय पुराण में कहा है-

‘अकृत्वा वास्तुपूजां यः प्रविशेन्नवमन्दिरम् ।
रोगान् नानाविधान् केशानश्नुते सर्वसङ्कटम् ॥
अपाटमनाच्छन्नमदत्त बलिभोजनम् ।
गृहं न प्रविशेदेवं विपदामाकरं हि तत् ॥ “
(बृहन्नारदीय पुराण, पूर्वखण्ड, अध्याय ५६ श्लोक

६१८- ६१९, पत्र ११६)

तदनुसार मन्दिर में द्वार (कपाट = किवाड़) जबतक
नहीं बनता तथा मन्दिर पर जबतक आच्छादन नहीं होता
अर्थात् मन्दिर जबतक नहीं ढका जाता और वहाँ वास्तुशान्ति जबतक नहीं होती तथा उसमें देवताओं को यथायोग्य माषभक्त बलि एवं पायसबलि नहीं दी जाती तथा वास्तुशान्ति का अद्‌भूत ब्राह्मणभोजन जबतक नहीं होता तबतक मन्दिर में देवप्रतिष्ठा नहीं हो सकती ।

लोकव्यवहार में एक मंजिल (भवन) बनने पर भी वास्तु- शान्ति करके लोग गृहप्रवेश करते हैं। बाद में गृह का ऊपरी भाग बनता है। अत: पूर्ण भवन बनने पर ही वास्तु प्रवेश होगा ऐसा नहीं कहा जा सकता। देवमन्दिर देवगृह है, अतः उसमें उक्त नियम लागू होगा प्रस्तुत अयोध्या के राममन्दिर में प्रतिष्ठा के पूर्व वास्तुशान्ति, बलिदान एवं ब्राह्मण भोजन होने वाला है। मन्दिर के दरवाजे लग गये हैं। गर्भगृह पूर्ण रूप से शिलाओं द्वारा ढका गया है। अतः उसमें रामप्रतिष्ठा करने में कोई दोष नहीं है। मन्दिर का काम पूर्ण होने पर कर्मकाण्ड प्रदीप में उद्धन प्रतिष्ठासार दीपिकोक्त कलशारोपणविधि के अनुसार कलशारोपणहोगा।

द्वितीय प्रश्न
२२ जनवरी २०२४ को छोड़ अन्यमुहूर्त क्यों नहीं लिया गया ?

द्वितीय प्रश्न का उत्तर

२२ जनवरी २०२४ पौष शुक्ल द्वादशी सोमवार मृगशीर्ष नक्षत्र के दिन सर्वोत्तम मुहूर्त है इसकारण उसे लिया गया।
२२ जनवरी २०२४ के पूर्व विजयादशमी के दिन गुणवत्तर लग्न नहीं मिलता। गुरु वक्री होने से दुर्बल है।
बलिप्रतिपदा को मंगलवार है। यह वार गृहप्रवेश में निषिद्ध है। अनूराधानक्षत्र में घटचक्र की शुद्धि नहीं है। अग्निवाण भी है। अग्निबाण में मन्दिर में मूर्तिप्रतिष्ठा होने पर आग लगकर हानि होती है।

२५ जनवरी २०२४ पौषशुक्ल पूर्णिमा को मृत्युबाण है। मृत्युवाण में प्रतिष्ठा होने पर लोगों की मृत्यु हो सकती है।

४ माघ- फाल्गुन में कहीं बाण शुद्धि नहीं मिलती तो कहीं पक्षशुद्धि नहीं मिलती तथा कहीं तिथ्यादि की शुद्धि नहीं मिलती । माघ शुक्ल आदि में गुरु कर्काश (उच्चांश) का नहीं है।
५) १४ मार्च २०२४ से खरमास है। अर्थात् मीनार्क है। मीनार्क मेंउत्तर भारत में प्रतिष्ठादि शुभ कार्य नहीं होते।

९ अप्रैल २०२४ को वर्षारम्भ दिन है। उसमें मङ्गलवार, वैधृति एवं क्षीणचन्द्र दोष हैं।
-रामनवमी १७ अप्रैल २०२४ को मेषलग्न पापाक्रान्त है तथा उसे लेने पर दादश में बुध-शुक्र जाते हैं।

  • वृषलग्न लेने पर द्वादश में गुरु एवं चतुर्थेश सूर्य जाते हैं। बाद में आश्लेषा नक्षत्र है।

-२४ अप्रैल वैशाखष्ण प्रतिपदा को मृत्युबाण है।
-२८ अप्रैल को शुक्र का वार्धक्यारम्भ है।
-५ मई को गुरु का वार्धक्यारम्भ है।

-७जुलाई रथयात्रा के दिन रविवार है।
१२) १७ जुलाई से चतुर्मास है।
१३) १२ अक्टूबर २०२४ विजयादशमी को शनिवार है। गुरु वक्री है।
२ नवम्बर बलिप्रतिपदा को शनिवार है। गुरु वक्री है।
१५) ३ फरवरी तक गुरू वक्री होने से मुहूर्त में गुरुबल नहीं। (१६) माघशुक्ल दशमी:शुक्रवार को शुद्ध एवं बलक्तर लग्न नहीं मिलता ।
(१७) माघ शुक्ल प्रयोदशी सोमवार १० फरवरी २०२५ को अग्निबाण है। पुनर्वसूनक्षत्र पापाक्रान्त है।
आगे कहीं चन्द्रशुद्धि नहीं। कहीं पक्ष की शुद्धि नहीं। कहीं शुद्ध नक्षत्र नहीं। कहीं बाणशुद्धि नहीं। कहीं तिथि-बार की शुद्धि नहीं।

-फाल्गुन पूर्णिमा १४ मार्च को खरमासारम्भ
-३० मार्च २०२५ को वर्षारम्भ के दिन रविवार।
-रामनवमी के दिन रविवार ।
-आगे कहीं व्यतीपात, कहीं वैधृति, कहीं इतर अशुद्धि।

  • गुरु शत्रुराशि में होने से मुहूर्त में गुरुबल की कमी।
    -२ जून २०२६ ‌को गुरु कर्क में जायेगा। उस समय अधिक ज्येष्ठ कृष्णपक्ष रहेगा।
    (ख) १६ जून २०२६ से शुद्ध ज्येष्ठ शुक्ल प्रारंभ होगा। पूर्ण लग्न‌शुद्धि नहीं मिलती। तब तक प्रतीक्षा कर शुद्ध मुहूर्त को खोजने चलने पर कौन रहेगा? कौन नहीं रहेगा जानकार विद्वान् ?
    अतः इन सब बातों का विचार करके २२ जनवरी २०२४ का राम प्रतिष्ठा मुहूर्त दिया गया है।
    पूर्व में आनन-फानन में जो मुहूर्त लोगों ने दिया उसमें कुछ कमी थी इसी कारण मन्दिर तोड़े गये । अतः सभी बातों को ध्यान में रखकर २२ जनवरी २०२४ को प्रतिष्ठा का मुहूर्त दिया गया है। इसमें लग्नस्थ गुरु की दृष्टि पञ्चम, सप्तम एवं नवम पर होने से मुहूर्त उत्तम है। मकर का सूर्य हो जाने से पौषमास का वर्ज्यत्व (दोष) समाप्त हो जाता है। भगवान् की कृपा से, गुरुजनों के आशीर्वाद से उपर्युक्त उत्तम मुहूर्त मिला है। अधकचरे लोगों द्वारा बिना प्रमाण के प्रश्न उपस्थापित एवं प्रचारित किये जाते हैं उनमें कोई तत्व नहीं है।

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